नफरत की सियासत और असली मुद्दों से भटकाव

चुनावी मौसम और बदली हुई जुबान बिहार, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चुनावी आहट होते ही नेताओं की भाषा बदल चुकी है। विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों की बजाय अब जाति-धर्म का ज़हर घोला जा रहा है। वोट बैंक सुरक्षित करने के लिए गाली-गलौज और नफरत भरे भाषण आम हो गए हैं। सत्ता बनाम जवाबदेही सत्ता में बैठी पार्टियां हों या विपक्ष—सबका रवैया एक जैसा है। हर समस्या का दोष पिछली सरकारों पर डाल दिया जाता है। लेकिन सवाल अब भी खड़े हैं: भ्रष्टाचार क्यों बढ़ रहा है? सड़कें और अस्पताल क्यों नहीं बन रहे? महिलाएं असुरक्षित क्यों हैं? नौकरशाही में रिश्वतखोरी क्यों हावी है? असली मकसद नेताओं को पता है कि जब जनता भयभीत होगी तो वह मुद्दों पर नहीं, भावनाओं पर वोट करेगी। कभी हिंदुओं का भय दिखाया जाता है, तो कभी मुसलमानों का। यही “तुष्टिकरण बनाम ध्रुवीकरण” की राजनीति है। जनता की भूमिका लोकतंत्र का रास्ता डर और नफरत से नहीं, बल्कि विकास और पारदर्शिता से गुजरता है। जब तक जनता इनकी नफरती राजनीति की “ग्राहक” बनी रहेगी, हालात नहीं बदलेंगे। अब समय है कि जनता धर्म-जाति की दीवारें तोड़कर नेताओं से वास्तविक सवाल पूछे— रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के।

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