प्रगति मैदान वर्ल्ड बुक फेयर: ‘सैनिक पत्नियों की कथा और व्यथा’ का हुआ विमोचन



 नई दिल्ली: दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित वर्ल्ड बुक फेयर के पहले दिन प्रसिद्ध लेखिका वंदना यादव की पुस्तक “सैनिक पत्नियों की कथा और व्यथा” का भव्य लोकार्पण किया गया। प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का विमोचन हॉल नंबर 2 स्थित लेखक मंच पर संपन्न हुआ।

इस अवसर पर प्रभात प्रकाशन के डायरेक्टर पवन अग्रवाल ने कहा कि यह पुस्तक सैनिक पत्नियों के जीवन की उन सच्ची कहानियों को सामने लाती है, जिन्हें समाज अक्सर नजरअंदाज कर देता है। उन्होंने कहा,
“यह पुस्तक सैनिक पत्नियों के त्याग, धैर्य और साहस की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करती है, जो हर भारतीय को गर्व से भर देगी।”

सैनिक बनना मिडिल क्लास का फैसला: वंदना यादव

पुस्तक की लेखिका वंदना यादव ने अपने वक्तव्य में सैनिक परिवारों की सामाजिक और भावनात्मक स्थिति पर गहरी बात रखी। उन्होंने कहा,
“देखिए, सैनिक अमीर तबके से नहीं आते। उनके पास बिजनेस घराने या बेहिसाब पैसा नहीं होता। सैनिक बनना मिडिल क्लास का फैसला है, जहां देशभक्ति सर्वोपरि होती है।”

उन्होंने आगे कहा कि यह किताब किसी कल्पना का परिणाम नहीं, बल्कि उनके भीतर पहले से मौजूद अनुभवों और भावनाओं की अभिव्यक्ति है।
“किताब को आकार देना पड़ा ही नहीं, ये मेरे अंदर पहले से था। ट्रेनिंग की तरह हमें भी तैयार कर दिया जाता है। बस, मैंने उन सच्ची कहानियों का चुनाव किया, जो सिविलियंस को चौंका देंगी—ऐसी बातें, जिनके बारे में उन्हें शायद पता ही नहीं था।”

सैनिक परिवारों के त्याग को नई रोशनी देती पुस्तक

“सैनिक पत्नियों की कथा और व्यथा” भारतीय सैनिक परिवारों, विशेषकर सैनिक पत्नियों की त्यागमयी, संघर्षपूर्ण और साहसिक जिंदगी को नई रोशनी देती है। यह पुस्तक न केवल सैनिक परिवारों के अनुभवों को दर्ज करती है, बल्कि आम नागरिकों को उस भावनात्मक संघर्ष से भी रूबरू कराती है, जो वर्दी के पीछे छिपा होता है।

परिचर्चा में कई विशिष्ट अतिथि रहे मौजूद

पुस्तक विमोचन के साथ आयोजित परिचर्चा में मिलिंद सुधाकर न्यास, कर्नल मलिक और विशाल दुबे भी मौजूद रहे। वक्ताओं ने पुस्तक की विषयवस्तु की सराहना करते हुए इसे समाज के लिए जरूरी और संवेदनशील दस्तावेज बताया।

कार्यक्रम के अंत में वक्ताओं ने कहा कि यह पुस्तक केवल पढ़ने योग्य ही नहीं, बल्कि हर भारतीय के लिए जरूरी है, ताकि वे सैनिक परिवारों के योगदान और बलिदान को सही मायने में समझ सकें।

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