नोएडा।आगामी केंद्रीय बजट को लेकर देशभर में जहां विभिन्न वर्गों की उम्मीदें टिकी हुई हैं, वहीं लगभग 70 लाख से अधिक सेवानिवृत्त बुजुर्ग कर्मचारी सरकार की ओर आशाभरी निगाहों से देख रहे हैं। इन बुजुर्गों की सबसे बड़ी और वर्षों पुरानी मांग है कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के अंतर्गत मिलने वाली न्यूनतम पेंशन, जो वर्तमान में मात्र 1000 रुपये प्रति माह है, उसे बढ़ाकर 7500 रुपये प्रति माह किया जाए, ताकि वे सम्मानपूर्वक जीवन यापन कर सकें।
इन पेंशनभोगियों का कहना है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में देश के औद्योगिक, आर्थिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें ऐसी मामूली पेंशन पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे न तो बुनियादी जरूरतें पूरी हो पा रही हैं और न ही सम्मानजनक जीवन संभव है।
नोएडा में इस मुद्दे पर सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और पेंशन आंदोलन से जुड़े अजीत सिंह ने कहा कि पिछले करीब दस वर्षों से बुजुर्ग कर्मचारी सरकार से लगातार न्यूनतम ईपीएफ पेंशन बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। देश के कोने-कोने में इस मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन, ज्ञापन और आंदोलन भी हो चुके हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस और निर्णायक कदम नहीं उठाया गया है।
अजीत सिंह ने कहा, “श्रम मंत्रालय को इस गंभीर सामाजिक मुद्दे की चिंता करनी चाहिए। यह केवल आर्थिक सवाल नहीं, बल्कि बुजुर्गों के सम्मान और आत्मनिर्भरता का प्रश्न है। इस वर्ष के बजट में सरकार को लाखों बुजुर्ग पेंशनभोगियों की मांग को स्वीकार कर लेना चाहिए।”
पेंशनभोगियों का कहना है कि वर्तमान समय में महंगाई लगातार बढ़ रही है। दवाइयों, इलाज, किराया, बिजली-पानी और दैनिक जरूरतों की कीमतें कई गुना बढ़ चुकी हैं, जबकि पेंशन आज भी उसी स्तर पर है, जो वर्षों पहले तय की गई थी। 1000 रुपये की राशि आज के दौर में प्रतीकात्मक बनकर रह गई है।
इस मुद्दे का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आज जो युवा निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं, वे भी भविष्य में इसी ईपीएफ पेंशन प्रणाली के अंतर्गत आएंगे। पेंशनभोगियों का मानना है कि यदि आज सरकार इस व्यवस्था को मजबूत करती है, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य की नींव बनेगी।
अजीत सिंह ने आगे कहा, “जो नौजवान आज निजी क्षेत्र में नौकरी कर रहे हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि यह लड़ाई केवल वर्तमान बुजुर्गों की नहीं, बल्कि उनके अपने भविष्य की भी है। सेवा निवृत्ति के बाद उन्हें भी इसी व्यवस्था पर निर्भर रहना होगा।”
पेंशनभोगी बुजुर्गों का कहना है कि वे सरकार से कोई विशेष सुविधा या अतिरिक्त लाभ नहीं मांग रहे, बल्कि केवल इतना चाहते हैं कि उनकी न्यूनतम पेंशन इतनी हो जाए कि वे दूसरों पर आश्रित हुए बिना अपना जीवनयापन कर सकें। सम्मानपूर्वक जीना हर नागरिक का अधिकार है, और यह अधिकार जीवन के अंतिम पड़ाव में और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
देशभर में ईपीएफ पेंशन बढ़ोतरी को लेकर कई संगठन, यूनियन और सामाजिक मंच सक्रिय हैं। इन संगठनों का मानना है कि सरकार यदि चाहें तो बजट के माध्यम से इस समस्या का स्थायी समाधान निकाल सकती है। न्यूनतम पेंशन को 7500 रुपये करने से न केवल बुजुर्गों को राहत मिलेगी, बल्कि सामाजिक असमानता भी कुछ हद तक कम होगी।
आगामी यूनियन बजट को लेकर अब इन लाखों बुजुर्गों की उम्मीदें और भी प्रबल हो गई हैं। वे मानते हैं कि यदि सरकार वास्तव में “सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास” की भावना पर कार्य कर रही है, तो उसे उन लोगों की आवाज भी सुननी चाहिए, जिन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा देश की सेवा में लगा दिया।
अब देखना यह होगा कि आने वाला बजट इन बुजुर्ग पेंशनभोगियों के लिए राहत का संदेश लाता है या उनकी वर्षों पुरानी उम्मीदें एक बार फिर अधूरी रह जाती हैं।

