लखनऊ में पशु-अधिकारों के समर्थन में उमड़ा जनसैलाब
Lucknow में रविवार को एक अनूठा और ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला, जब लगभग 1200 नागरिक “हल्ला बोल पिंजरा तोड़” और “नो केजेस, नो शेल्टर” के नारों के साथ सड़कों पर उतरे। यह रैली पशुओं के कारावास और उन्हें उनके प्राकृतिक परिवेश से दूर निर्वासित करने की अवधारणा के विरोध में आयोजित की गई थी। गोमती के तट पर एकत्रित लोगों ने स्पष्ट संदेश दिया कि पशु-कल्याण का मुद्दा केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, मानवीय और कानूनी दृष्टिकोण से जुड़ा विषय है।
विविध वर्गों की भागीदारी ने बनाया आयोजन को विशेष
इस रैली की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें समाज के विभिन्न वर्गों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। विद्यालयी बच्चों से लेकर युवाओं, ट्रांसजेंडर समुदाय, दिव्यांग विद्यार्थियों, बाइकर समूहों, कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं तक—सभी ने एक मंच पर आकर पशु-अधिकारों के समर्थन में आवाज बुलंद की। प्रतिभागियों ने बैनर और तख्तियों के माध्यम से संदेश दिया कि स्थायी समाधान कैद या विस्थापन नहीं, बल्कि सहअस्तित्व है।
गोमती नदी के ऊपर से शांतिपूर्ण मार्च करते हुए लोगों ने यह प्रदर्शित किया कि यह आंदोलन किसी टकराव का नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप संवाद और नीति-संशोधन का है। पूरे आयोजन में अनुशासन और सकारात्मक ऊर्जा का वातावरण रहा।
वैज्ञानिक समाधान के रूप में ABC नियमों पर जोर
रैली में वक्ताओं और प्रतिभागियों ने पशु जन्म नियंत्रण (ABC) नियमों को मानव–कुत्ता सहअस्तित्व का व्यावहारिक और दीर्घकालिक समाधान बताया। उनका कहना था कि आवारा कुत्तों या अन्य पशुओं को पकड़कर शेल्टर में बंद करना समस्या का स्थायी हल नहीं है। इसके बजाय वैज्ञानिक नसबंदी, नियमित टीकाकरण और सामुदायिक सहभागिता से ही संतुलित व्यवस्था स्थापित की जा सकती है।
विशेषज्ञों ने यह भी रेखांकित किया कि उच्चतम न्यायालय और केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर जारी दिशा-निर्देशों का पालन करना आवश्यक है। यदि कानून के अनुरूप कार्य किया जाए, तो मानव सुरक्षा और पशु-कल्याण दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।
प्रमुख हस्तियों की उपस्थिति ने बढ़ाई महत्ता
कार्यक्रम में देशभर से आए कई प्रतिष्ठित पशु-अधिकार कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों ने भाग लिया। प्रमुख रूप से Ambika Shukla, Gauri Maulekhi और Sankshay Babbar मौजूद रहे।
अपने संबोधन में संक्षय बब्बर ने कहा, “यह जनउद्गार इस बात का प्रमाण है कि समाज अमानवीय और अवैज्ञानिक समाधानों को स्वीकार नहीं करेगा। पशुओं के प्रति करुणा हमारी सांस्कृतिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। जब तक कोई वैज्ञानिक, मानवीय और विधिसम्मत नीति लागू नहीं की जाती, तब तक नागरिक अपनी आवाज उठाते रहेंगे।”
वरिष्ठ अधिवक्ता Percival Billimoria की उपस्थिति ने कार्यक्रम को कानूनी दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बना दिया। उन्होंने पशु-कल्याण से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों और नागरिक जिम्मेदारियों पर प्रकाश डाला।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और पैनल चर्चा ने दिया व्यापक आयाम
रैली के उपरांत बैंड प्रस्तुतियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें गीत-संगीत के माध्यम से करुणा और सहअस्तित्व का संदेश दिया गया। इसके बाद एक विशेषज्ञ पैनल चर्चा और प्रेस सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें पशु-नीति, प्रशासनिक चुनौतियों और समाज की भूमिका पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया।
आयोजन का संचालन Animal Rights और India4Animals द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। आयोजकों ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी भी प्रकार का संघर्ष उत्पन्न करना नहीं, बल्कि नीति-निर्माताओं और समाज के बीच रचनात्मक संवाद स्थापित करना है।
सहअस्तित्व का संदेश बना रैली का मुख्य स्वर
रैली ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि पशु-कल्याण का मुद्दा केवल भावनाओं तक सीमित नहीं है। यह वैज्ञानिक शोध, कानूनी प्रावधानों और मानवीय मूल्यों के संतुलन का विषय है। यदि प्रशासन, नागरिक समाज और विशेषज्ञ मिलकर कार्य करें, तो ऐसा मॉडल विकसित किया जा सकता है जिसमें मानव और पशु दोनों सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी सकें।
गोमती के तट से उठी यह आवाज अब व्यापक सामाजिक चर्चा का हिस्सा बन चुकी है। प्रतिभागियों का मानना है कि यह पहल केवल लखनऊ तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि देशभर में पशु-अधिकारों के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता को नई दिशा देगी। यह रैली इस बात का प्रतीक बन गई कि जब समाज एकजुट होकर मानवीय मूल्यों के लिए खड़ा होता है, तो परिवर्तन की राह अवश्य प्रशस्त होती है।
