नई दिल्ली।
संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार के उद्देश्य से रामायण रिसर्च काउंसिल के तत्वावधान में एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने की घोषणा की गई है। इस अभियान का नेतृत्व काउंसिल के ट्रस्टी एवं उदासीन संगत ऋषि आश्रम, रानोपाली (अयोध्या) के श्रीमहंत डॉ. स्वामी भरत दास जी महाराज करेंगे।
डॉ. स्वामी भरत दास जी ने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की सनातन चेतना और सांस्कृतिक आत्मा है। उन्होंने बताया कि इस अभियान के माध्यम से सनातन परिवारों को संस्कृत के शिक्षण-प्रशिक्षण के प्रति जागरूक किया जाएगा और इसे जन-आंदोलन का स्वरूप दिया जाएगा।
60 दिवसीय संस्कृत कोर्स और डिजिटल माध्यमों पर ज़ोर
डॉ. भरत दास जी ने जानकारी दी कि रामायण रिसर्च काउंसिल द्वारा संस्कृत भाषा पर आधारित 60 दिनों का विशेष कोर्स तैयार किया गया है। इस कोर्स के अंतर्गत 60 शैक्षणिक वीडियो और एक टेक्स्ट बुक भी विकसित की जा रही है।
इन शैक्षणिक संसाधनों के माध्यम से देश के विभिन्न शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संस्थानों में संस्कृत शिविर आयोजित किए जाएंगे, जहाँ प्रतिभागियों को देवभाषा संस्कृत की महत्ता, उसकी व्यावहारिक उपयोगिता और संरक्षण की आवश्यकता से अवगत कराया जाएगा।
रामायण वार्ता पत्रिका और संस्कृत के लिए सतत प्रयास
रामायण रिसर्च काउंसिल के महासचिव कुमार सुशांत ने बताया कि संस्था प्रत्येक वर्ष संस्कृत भाषा के उत्थान में योगदान देने वाले विद्वानों और कर्मयोगियों को सम्मानित करती है। साथ ही, पिछले तीन वर्षों से संस्कृत भाषा में प्रकाशित ‘रामायण वार्ता’ नामक पाक्षिक पत्रिका निरंतर प्रकाशित की जा रही है।
उन्होंने बताया कि इस पत्रिका के मुख्य संपादक डॉ. स्वामी भरत दास जी महाराज हैं और यह संस्कृत साहित्य व विचारधारा के प्रसार का एक सशक्त माध्यम बन चुकी है।
IIT पटना की भूमिका और तकनीक से संस्कृत का विस्तार
डॉ. भरत दास जी ने कहा कि IIT पटना, रामायण वार्ता की नोडल संस्था के रूप में कार्य कर रही है और तकनीकी माध्यमों के ज़रिये संस्कृत को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास कर रही है। आने वाले समय में देश के अन्य IIT संस्थानों को भी इस अभियान से जोड़ा जाएगा, जिससे संस्कृत के प्रचार को आधुनिक तकनीक से बल मिल सके।
विद्वानों से श्रमदान की अपील, सरकारों की सराहना
डॉ. स्वामी भरत दास जी ने देशभर के संस्कृत विद्वानों, शिक्षकों और साधकों से इस अभियान में श्रमदान के माध्यम से जुड़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि संस्कृत का संरक्षण केवल संस्थाओं की नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने देवभाषा संस्कृत और सनातन संस्कृति के संरक्षण एवं प्रसार के लिए केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की भी खुलकर प्रशंसा की।

