पश्चिम को सुनाया भारत का ज्ञान! और फिर बोले… सिर्फ पैसा काफी नहीं! -आचार्य प्रशांत

 


दार्शनिक, लेखक और आध्यात्मिक चिंतक आचार्य प्रशांत ब्रिटेन दौरे का दूसरा चरण पूरा कर भारत लौट आए हैं। दिल्ली के आईजीआई एयरपोर्ट पर मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि उनके इस दौरे का मुख्य उद्देश्य पश्चिमी समाज को भारत के वास्तविक दर्शन और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से परिचित कराना था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “भौतिक प्राप्ति जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन केवल वही पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को आंतरिक शांति, आत्मबोध और जीवन के गहरे अर्थ की भी आवश्यकता होती है।”

ब्रिटेन में अपने प्रवास के दौरान आचार्य प्रशांत ने कई प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में व्याख्यान दिए। इनमें University of Cambridge, University of Oxford, University College London और London School of Economics जैसे संस्थान शामिल रहे। इन व्याख्यानों में उन्होंने भारतीय दर्शन, भगवद्गीता, अहिंसा, आत्मबोध और आधुनिक जीवन की चुनौतियों जैसे विषयों पर अपने विचार रखे।

लंदन के ऐतिहासिक St Giles' Church में आयोजित विशेष सत्र में उन्होंने गीता के संदेश को आधुनिक संदर्भों में समझाया। इस कार्यक्रम में भारतीय समुदाय के अलावा बड़ी संख्या में स्थानीय लोग भी शामिल हुए। आचार्य प्रशांत के अनुसार, पश्चिमी समाज में अब भारतीय आध्यात्मिक विचारों के प्रति उत्सुकता तेजी से बढ़ रही है।

उन्होंने कहा कि भारत का आध्यात्मिक ज्ञान केवल किसी एक देश या संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी मानवता के लिए प्रासंगिक है। उनके अनुसार आज दुनिया जिस मानसिक तनाव, प्रतिस्पर्धा और असंतुलन से गुजर रही है, उसमें भारतीय दर्शन जीवन को संतुलित करने का मार्ग दिखा सकता है।

आचार्य प्रशांत ने पश्चिम की उपलब्धियों की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन और भौतिक विकास के क्षेत्र में पश्चिम ने उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन अब वहां भी बड़ी संख्या में लोग यह महसूस कर रहे हैं कि केवल आर्थिक सफलता और उपभोग से स्थायी संतोष नहीं मिलता। लोग जीवन के वास्तविक उद्देश्य, आंतरिक शांति और आत्मिक समझ की तलाश में हैं।

मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि “मनुष्य को रोटी, कपड़ा, मकान और सुविधाएं चाहिएं, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन यदि उसके भीतर बेचैनी, भय और असंतोष बना रहे, तो बाहरी उपलब्धियां भी अधूरी रह जाती हैं। इसलिए भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक जागरूकता दोनों का संतुलन जरूरी है।”


उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय दर्शन का मूल संदेश मनुष्य को स्वयं को जानने की प्रेरणा देता है। जब व्यक्ति अपने भीतर के भ्रम, भय और लालसाओं को समझता है, तभी वह वास्तविक स्वतंत्रता का अनुभव कर सकता है। उनके अनुसार यही संदेश आज वैश्विक स्तर पर लोगों को आकर्षित कर रहा है।

आचार्य प्रशांत ने प्रेम और सत्य को जीवन का सर्वोच्च आधार बताते हुए कहा कि “प्रेम से बड़ा कोई उद्देश्य नहीं और सत्य से बड़ा कोई मिशन नहीं।” उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति सत्य के प्रति ईमानदार हो जाए और उसके जीवन में करुणा तथा प्रेम का विस्तार हो, तो व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर परिवर्तन संभव है।

ब्रिटेन दौरे के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि विभिन्न विश्वविद्यालयों और संस्थानों में छात्रों, शिक्षकों और शोधकर्ताओं के साथ गहन संवाद हुआ। कई प्रतिभागियों ने भारतीय ग्रंथों और दर्शन के अध्ययन में रुचि दिखाई तथा भविष्य में इस विषय पर और कार्यक्रम आयोजित करने की इच्छा व्यक्त की।

उन्होंने यह भी जानकारी दी कि ब्रिटेन दौरे का तीसरा चरण सितंबर-अक्टूबर में आयोजित किया जाएगा। इस बार वे उन आमंत्रणों को भी स्वीकार करेंगे जिन्हें समयाभाव के कारण वर्तमान यात्रा में शामिल नहीं किया जा सका। उनके अनुसार आगामी चरण में अधिक शहरों और संस्थानों में संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

भारत लौटने के बाद आचार्य प्रशांत ने कहा कि उनका प्रयास केवल प्रवचन देना नहीं, बल्कि पूर्व और पश्चिम के बीच एक सार्थक वैचारिक संवाद स्थापित करना है। उन्होंने विश्वास जताया कि भारतीय दर्शन की गहराई और आधुनिक चिंतन का समन्वय आने वाले समय में विश्व समाज को अधिक संतुलित और मानवीय दिशा दे सकता है।


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