जब मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा "बना है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता" होना पड़ा था दरबार में मुजरिम बनकर पेश

बात उस वक़्त की है बात जब ग़ालिब की प्रतिभा उस वक़्त के बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार तक नहीं पहुँची थी ! बादशाह खुद भी आलिम थे और शायरी भी किया करते थे उनके उस्ताद शेख इब्राहीम ज़ौक़ साहब थे ! उस समय ज़ौक़,ग़ालिब की प्रतिभा से अनजान थे ! ग़ालिब ग़रीबी का दौर झेल रहे थे ! एक रोज़ चाँदनी चौक में दोनों का आमना-सामना हो गया ! ज़ौक़ शाही पालकी में सवार थे ग़ालिब पसीने से तर पैदल ! ग़ालिब ने ये शेर का मिसरा बेसाख़्ता पढ़ा:-
बना है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता , ज़ौक़ को ये बात चुभ गयी ,सीधा बादशाह के पास चले गए ! बादशाह तैश में आ गए ग़ालिब को पकड़ के लाया गया ! बादशाह ग़ुस्से से बोले तेरी ये मजाल ,तू मेरे उस्ताद से बदतमीज़ी करे ? ग़ालिब ने जवाब दिया नहीं हुज़ूर मेरी नयी ग़ज़ल का शेर है दुहरा रहा था ! हुक्म हुआ पूरी ग़ज़ल क्या है सुनाइए ! उन्होंने जो ग़ज़ल सुनाई वो नीचे पेश है ! ये थी वो मशहूर ग़ज़ल :- हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है न शो'ले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा कोई बताओ कि वो शोख़-ए-तुंद-ख़ू क्या है ये रश्क है कि वो होता है हम-सुख़न तुम से वगर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़ी-ए-अदू क्या है चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन हमारे जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है वो चीज़ जिस के लिए हम को हो बहिश्त अज़ीज़ सिवाए बादा-ए-गुलफ़ाम-ए-मुश्क-बू क्या है पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो-चार ये शीशा ओ क़दह ओ कूज़ा ओ सुबू क्या है रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता वगर्ना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है उसको सुन कर बादशाह और ज़ौक़ दोनों ग़ालिब की प्रतिभा के क़ायल हो गए ! उन्हें इनामात से नवाज़ दिया गया ,दरबार में पद दे दिया गया वजीफा बंध गया ! जाते वक्त ग़ज़ल जिस काग़ज़ के टुकड़े से पढ़ रहे थे उस्ताद ज़ौक़ को दे दिया ! ज़ौक़ ने अदब से काग़ज़ को आँख से लगाया लेकिन खोल के देखा तो वो ये देखकर हैरत में पड़ गए की कागज़ कोरा था !

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